Monday, December 31, 2012

Worship Place - Temple (पूजाघर वास्तुशास्त्र के अनुसार)



वास्तुशास्त्र के अनुसार, पूजा एवं प्रार्थना के लिए सर्वोत्तम स्थान र्इशान कोण को माना जाता है, परन्तु आवश्यकतानुसार भवन के पूर्व या उत्तर दिशा में भी पूजा घर बनाया जा सकता है, लेकिन दक्षिण दिशा में पूजा घर का निर्माण नहीं करना चाहिए। चूंकि अध्ययन कक्ष में पूजा घर बनाया जा सकता है, परन्तु इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसमें संयुक्त शौचालय की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए। पूजाघर की व्यवस्था शयन कक्ष में भी नहीं होनी चाहिए। पूजा घर में देवी एवं देवताओं की मूर्तियों या चित्रों को लकड़ी की चौकी अथवा सिंहासन के उपर स्थापित करना चाहिए। पूजा घर के कमरे का फर्श अन्य कमरों से उंचा नहीं होना चाहिए एवं पूजा घर में अनुपयोगी एवं अनावश्यक सामान नहीं रखना चाहिए।

पूजाघर में स्थापित देवी-देवताओं की मूर्तियों अथवा चित्रों का मुख उत्तर अथवा पूर्व दिशा की ओर रखना चाहिए।

किसी भी जीवित अथवा मृत व्यकित का चित्र भले ही वह आपका अत्यंत प्रिय या निकटतम क्यों ना हो, पूजा स्थल में नहीं रखना चाहिए। इस प्रकार के चित्रों को पूजा घर अथवा घर के किसी भी कमरे में दक्षिणी दीवार पर लगाया जा सकता है।

Main Entrance Door (मकान का मुख्य द्वार)


 मकान के मुख्य द्वार का निर्माण सदैव वास्तु के अनुसार बताए गए शुभ पदों में ही करना शुभ होता है। मुख्य द्वार को स्थापित करते समय इस बात का ध्यान रखें कि वह कभी भी भूखण्ड के बढ़े हुए अथवा कटे हुए भाग में ना हो। आवसीय अथवा व्यावसायिक किसी भी मकान के मध्य में मुख्य द्वार नहीं बनाना चाहिए। इस प्रकार के द्वार की स्थापना धार्मिक स्थलों के लिए ही अनुकूल होता है। मकान के मध्य में मुख्य द्वार बनाने से परिवार का नाश हो जाता है। मुख्य द्वार का निर्माण इस प्रकार करवाना चाहिए कि वह सदैव मकान के भीतर की ओर ही खुले एवं मुख्य द्वार मकान में बने अन्य द्वारों की तुलना में अधिक सुन्दर, भव्य व बड़ा होना चाहिए। साथ ही मुख्य द्वार में दहलीज अवश्य ब नाना चाहिए। मुख्य द्वार स्थापित करते समय यह ध्यान देना चाहिए कि मकान के पूर्व व पशिचम तथा उत्तर व दक्षिण दोनों दिशा में द्वार आमने-सामने नहीं होना चाहिए। मकान के मुख्य द्वार को कभी भी सड़क, गली अथवा किसी भी प्रकार के वेध के ठीक सामने स्थापित नहीं करना चाहिए। वेध से हटाकर मुख्य द्वार की स्थापना करना ही शुभ रहेगा।

वास्तुशास्त्र के अनुसार द्वार की लम्बार्इ व चौड़ार्इ का सर्वमान्य व उत्तम अनुपात 1:2 का माना जाता है। आवश्यकतानुसार बढ़ाया जा सकता है परन्तु यह 1:3 से अधिक नहीं होना चाहिए। व्यावसायिक स्थलों के लिए अर्थात दुकान व कार्यालय आदि के लिए यह अनुपात मान्य नहीं है।

आवासीय मकानों में द्वार की संख्या सम होनी चाहिए जैसे 2, 4, 6 व 8। परन्तु यह संख्या शून्य में नहीं होनी चाहिए जैसे 10, 20, 30 आदि। मुख्य द्वार की स्थापना सदैव वास्तु के अनुसार शुभ मुहुर्त में ही करना चाहिए। मुख्य द्वार यदि लकड़ी का बनाना हो तो सदैव ऐसी लकड़ी का प्रयोग करना चाहिए कि उसके दरवाजे कभी भी बाद में जाकर सिकुड़ने अथवा झुकने ना पाएं। यदि नए मकान का निर्माण हो रहा हो तो उसमें किसी प्रकार के पुराने दरवाजे का प्रयोग नहीं करना चाहिए। मुख्य द्वार की देखभाल, रंग-रोगन आदि समय-समय पर करते रहना चाहिए एवं इसकी सजावट का ध्यान रखना चाहिए।

इस बात का सदैव ध्यान रखें कि मकान का कोर्इ भी दरवाजा खुलते अथवा बंद होते समय किसी प्रकार की ध्वनि ना उत्पन्न करे। इसके लिए इनके कब्जों में तेल आदि लगाते रहना चाहिए। दरवाजों द्वारा ध्वनि उत्पन्न करना अशुभ माना जाता है। मकान के मुख्य द्वार को सदैव साफ, सुन्दर व सुसजिजत रखना चाहिए। इस पर ओम, स्वासितक चिन्ह, कुलदेवता का चित्र, गज लक्ष्मी का चित्र, तोरण आदि बनाना चाहिए। मुख्य द्वार कभी भी किसी प्रकार से मुड़ा हुआ, झुका हुआ अथवा टूटा हुआ होने पर मकान की अशुभता में वृद्धि होती है। मकान के पिछले द्वार का निर्माण घर में बने अन्य द्वारों की तुलना में छोटा रखना चाहिए।

यदि मकान का मुख्य द्वार पूर्व दिशा की ओर सिथत हो तो वास्तुशास्त्र में इसे सर्वाधिक शुभ फलदायक माना गया है। इसीलिए इसे शुभता की दृषिट से प्रथम स्थान प्राप्त है। पूर्व की ओर मुख्य द्वार वाले आवास में सभी प्रकार के सुख व समृद्धि आती है एवं ऐसे आवास में सदैव अच्छ आदमियों का आना-जाना लगा रहता है।

वास्तुशास्त्र के अनुसार पशिचम की ओर मुख्य द्वार का होना भी शुभ फलदायक होता है। शुभता की दृषिट से पशिचमी मुख्य द्वार को पूर्वी मुख्य द्वार के बाद दूसरा स्थान प्राप्त है। पशिचम दिशा का कारक शनि है एवं शनि मशीनों व लोहे आदि से संबंधित कायोर्ं का कारक भी है। इसलिए पशिचम की ओर मुख्य द्वार वाला मकान इंजीनियर, हाथों से कारीगिरी करने वाले अथवा मशीनों से संबंधित कार्य करने वालों के लिए अधिक शुभ परिणाम देने वाला साबित होता है।

यदि मकान का मुख्य द्वार उत्तर दिशा की ओर हो तो वास्तुशास्त्र में इसे भी शुभ माना जाता है। उत्तराभिमुख द्वार का संबंध व्यकित की उदारता व परोपकारिता से होता है। उत्तर की ओर दरवाजे वाले मकान में रहने वाले लोगों के द्वारा किए गए धार्मिक कार्य, पूजा-पाठ, लम्बी यात्रा अथवा किसी प्रकार के शुभ कार्य इनके लिए अधिक शुभ फलदायक होते हैं। ऐसा मकान आध्यातिमक उन्नति के लिए भी अनुकूल होता है।

दक्षिण दिशा की ओर मकान का मुख्य द्वार होना शुभ नहीं माना जाता है। दक्षिण की ओर मुख्य द्वार वाले मकान में रहने वाले लोगों को अथवा मकान स्वामी को बकरी का दान अथवा बुध की वस्तुओं का दान जैसे मूंग की दाल आदि का दान करते रहना चाहिए। ऐसा करने से मकान में होने वाली बीमारी, अनावश्यक विवाद या विवादपूर्ण परिसिथतियों से होने वाले मृत्यु तुल्य कष्टो आदि से सुरक्षा होती है। ऐसा माना जाता है कि दक्षिणी द्वार अपनी अशुभता का सम्पूर्ण प्रभाव तब देता है जब उस आवास में कोर्इ राहु आठ वाला बच्चा जन्म लेता है।

Wednesday, June 27, 2012

Hanumanji's Photo for car




||  Jay Siyaram .||
Hanumanji's  Photo for car

Nazar raksha kavach

                                      
                                         This is nazar raksha kavach set.

Sunday, March 25, 2012

Ganesh Stotra (sankat nasak ganesh stotra )

 

Shree Sankat Nasak GANESH Stotra


Astrology Lalkitab Vastu & healing (Mobile with yantra.mpg)





मोबईल अपनी उजॅा को कम करता हे ।
mobile is do few energy of human so that the sreeyantra & mahamrutyunjaya yantra can past on back side of mobile
Email:-sukeshtretiya@gmail.com
www.sukeshtretiya,blogspot.com

Thursday, March 15, 2012

saraswati yantra

This is Saraswati Yantra for students.

It is helpful to improve the level of study of the students...